Tuesday, 10 January 2017

ગઝલ

जब आँखोंसे नशा होने लगे इसी सर जमीं पर
सपनोके आसमां में मैखानेका इंतजाम न कर

चुपके से खामोश रहकर महोब्बत किया कर
लफ्जोंके बयाँ से तू रंजिश का इंतजाम न कर

ग़म मिले गर महोब्बतो में तो फ़ितरत समझ
अब नई फ़ितरत नए ग़म का इंतजाम न कर

वो आँखमे आँसुओंका शहेरा छोड़ के गया है
अब नये बादलोंकी बारिशका इंतजाम न कर

रास्ते वो ही है - हाथ छूटा है उनका साथ नहीं
तूँ अब कोई अलग कारवाँका इंतजाम न कर

वो ही तो रहीम-ओ-करीम है सबका यहाँ पर
ख़ुदा बदलनेका दूसरा कोई इंतजाम न कर 

तू "परम" के ही कदमो में तो है अभी और यहीँ
और कहीँ भी "पागल" होनेका इंतजाम न कर

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