On Death Anniversary of Shayar Nida Fazli......
जब से क़रीब हो के चले, ज़िन्दगी से हम
ख़ुद अपने आईने को लगे, अजनबी से हम
आँखों को दे के रोशनी गुल कर दिये चराग़
तंग आ चुके हैं वक़्त कि इस दिल्लगी से हम
अच्छे बुरे के फ़र्क ने बस्ती उजाड़ दी
मजबूर हो के मिलने लगे हर किसी से हम
वो कौन है जो पास भी है और दूर भी
हर लम्हा माँगते हैं किसी को किसी से हम
एहसास ये भी कम नहीं जीने के वास्ते
हर दर्द जी रहे हैं तुम्हारी खुशी से हम
कुछ दूर चलके रास्ते सब एक से लगे
मिलने गए किसी से मिल आये किसी से हम
किस मोड़ पर हयात ने पहुँचा दिया हमें
नाराज़ है ग़मों से ना खुश है खुशी से हम
-निदा फ़ाज़ली
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है
अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है
ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है
ये वक्त जो तेरा है, ये वक्त जो मेरा है
हर गाम पर पहरा है, फिर भी इसे खोना है
आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आंगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछौना है
निदा फ़ाज़ली
बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नही जाता!
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नही जाता!
सब कुछ तो है, क्या ढूंढ़ती रहेती है निगाहें?
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नही जाता!
वो एक ही चेहरा तो नही सारे जहां में?
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नही जाता!
मैं अपनी ही उल्ज़ी हुई राहो का तमाशा;
जाते है जिधर सब, मैं उधर क्यूँ नही जाता!
वो ख्वाब जो बरसो से ना चेहरा, ना बदन है;
वो ख्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नही जाता!
: निदा फाजली
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