Tuesday, 7 March 2017

ગઝલ

गझल

ऊडवानी होंश लईने बाजी लगावी दीधी
आकाश  मापवामां  पांखो  गुमावी दीधी

साच्चे ज आवशे तुं ऐवा खयाले में पण
मननी गलीकूंचीओ केवी सजावी दीधी

ऐ धुम्रथी आ आख्खुं आकाश लागे भूरुं
सपनाओना समिधे धूणी  धखावी  दीधी
           
पगलीओ धीमे धीमे ओ पाडजे, पियुजी !
बिस्तर उपर हवे तो आंखो बिछावी दीधी

छे अंधकार ऐवो के, ओतप्रोत  थईशुं
अवरोधती हती ऐ दीवी बूझावी दीधी

             भरत भट्ट

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