Monday, 17 April 2017

ગઝલ

खूदमांथी एक जण धीमे-धीमे पण ब्हार नीकळे छे
एटले के ते हवे सघली व्यथाथी पार नीकळे छे
    
धन्य छे ऐवी घडी देनारनी, लेनारनी, जोनारनी पण
खूदमांथी, ब्हारथी, चोपासथी ओमकार नीकळे छे
   
बाळनी मुस्कान ने आंखो तपासो वृद्ध माणसनी
बेयमांथी जिंदगी शुं होय ऐनो  सार नीकळे छे
     
साफ पाणीथी बधुं थै जाय छे ऐ वात साची पण
कोई चालुं नळ तपासो तो छूपेलो खार नीकळे छे
      
आंगळी चींधुं तो त्याथी फक्त बस आघात आवे छे
दुश्मनोने जे जगा धार्या हता त्यां यार नीकले छे
         ---धर्मेश उनागर

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