Tuesday, 25 April 2017

ગઝલ

कभी शादाब रहता है कभी रंजूर रहता है।
भला क्यूँ आदमी इस दौर में मजबूर रहता है।

मुझे वो थाम लेता है मेरे गिरने से पहले ही
जमाना जूठ कहता है वो मुझसे दूर रहता है।

मुखालिफ जो भी हो हाकिम का वो सूली पे चढ़ जाए
यही क़ानून है जगका यही दस्तूर रहता है।

तू उसको ढूंढता था सिर्फ ऊँचे आसमानों में।
न कर फ़रियाद अब नादाँ ,वो तुझ से दूर रहता है।

भला नक्काद क्या जाने सुखनवर किसको कहते है।
हमारे जिस्म में दिल की जगह नासूर रहता है।

मुझे कमतर समजने की खता करने दो दुनिया को।
मगर मुझमें भी तो महबूब का ही नूर रहता है।

-महेबुब सोनालिया ।

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