0 गझल 0
आ कोरीकट गझल तारा वगर, शुं छे
अहीं आ रेतमां भीनी असर शुं छे
अपेक्षाना किनारे हुं हजी ऊभो
समंदर जेम भीतर आ लहर शुं छे
लीलामय लागणीवश लीन थई जउं छुं
ऐ संवेदन अधूरुं के सभर शुं छे ?
तमे क्यांये पहोंची ना शको, पंथी !
अने पूछो पीडा शुं छे प्रहर शुं छे
अहीं अंधार ओढीने फरे कोई
ऊंघे छे रोशनीमां ऐ नगर शुं छे
भरत भट्ट
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