Tuesday, 4 April 2017

ગઝલ

गझ़ल

ऐने   तर्कनुं   तीर   मित्रो   कहे  छे
तूटी पण शके या खूंपी पण शके छे

आ पथ्थरपणुं साव तकलादी जाण्युं
जरा , तोडी जोयुं  तो जल थै वहे छे

सरोवरमां  डूबी  मरे  छे ,  परंतु
आ मछलीओ आंखोमां केवी तरे छे

आ अस्तित्वनुं ऐक अचरज छे ऐवुं
मिटी जईऐ तो पण दरद क्यां मटे छे

तने हुं गझलमां सतत मात्र घूंटुं
मने ठोठने बीजुं क्यां आवडे छे

         भरत भट्ट

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