गझ़ल
ऐने तर्कनुं तीर मित्रो कहे छे
तूटी पण शके या खूंपी पण शके छे
आ पथ्थरपणुं साव तकलादी जाण्युं
जरा , तोडी जोयुं तो जल थै वहे छे
सरोवरमां डूबी मरे छे , परंतु
आ मछलीओ आंखोमां केवी तरे छे
आ अस्तित्वनुं ऐक अचरज छे ऐवुं
मिटी जईऐ तो पण दरद क्यां मटे छे
तने हुं गझलमां सतत मात्र घूंटुं
मने ठोठने बीजुं क्यां आवडे छे
भरत भट्ट
No comments:
Post a Comment