Tuesday, 18 April 2017

ગઝલ

हजी ऐक ईच्छा वछूटे नहीं
हुं दोडुं अने मार्ग खूटे नहीं

युगोथी बधां तोय मथतां रह्यां
समय तांतणा  जेम  तूटे  नहीं

हजी  ठेरनी  ठेर  यात्रा  रही
पलाणो छतां अश्व छूटे नहीं

पलीतो मूको छो फरीथी तमे
मजा ऐ छे के तोप फूटे नहीं

शिखर पर रही क्यां हवे धारणा
के मस्तक हवे  कोई  कूटे  नहीं

            भरत भट्ट

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