Thursday, 25 May 2017

ગઝલ

मेरी नजरों में नजारो के हैं मंजर कितने,
तेरी आंखों में समाये है समंदर कितने ।

वो मेरे पास रहे ओर मेरी जान जले,
ओर सहेने हैं महोबत के नश्तर कितने ।

जो मेरी प्यास बढ़ी है तो बढ़ी रहेने दे,
मेरे सीने को अभी लगने को हैं खंजर कितने ।

तु मेरा साथ जो देता तो संवरती हस्ती,
मेरी किस्मत में फुरकत के है बंजर कितने।

में  भटकता रहा सहेरा में कइ सदीयो से,
क्या समज पाये है चाहत को ये कमतर कितने ।

ऐक वो हैं जीन्हे हम जी से भुला पाऐ नहीं,
युं तो आंखों में रहे हुस्न के पयकर कितने ।

करते है याद वो ही लोग फसानो में  हमें ,
हमसे मासूम जमाने बसे अकसर कितने।

              मासूम मोडासवी

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