Tuesday, 23 May 2017

ગઝલ

*गझल*

सवारी होय चेतकनी महाराणा बनी जाशुं
पराणे प्रेमनी वातो थकी पाणा बनी जाशुं

मने लक्ष्मी बनी जावुं उपासक जो खरो मळतो
भला माणस दिखावाथी अमे नाणा बनी जाशुं

सुकंठे शारदा बनवुं परंतु विश्र्व छे कर्कश
गळामां गर्व खोटो छे पछी गाणा बनी जाशुं

हजी मारे बनी औषध छे जगनी चाकरी करवी
अहंकारी दिवालो पर लदी छाणा बनी जाशुं

न अस्त्रोथी न शस्त्रोथी न मंत्रोथी न तंत्रोथी
सरळताथी कही जो जो अमे आणा बनी जाशुं

नजर मोती सदा शोधी रही पण ना मळे कारण
पराणे वस्त्रने खेंचो खरी दाणा बनी जाशुं

- कवि धार्मिक भा गढवी

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