Sunday, 28 May 2017

ગઝલ

जबसे हुवे हैं आप हमारे करीब तर,
हम हो गये हैं जैसे उजले नसीब तर।

कुदरत ने वादीयों को नइ जान बख्श दी,
तुमभी हमारी जानको करदो हबीब तर।

है चार दिनकी जिंदगी सब मानके जीये,
लगता है चार दिन का वाअदा अजीब तर।

बे जान जिंदगी में नइ जान फुंक कर,
अब तो मीटादो मर्ज ये बनके तबीब तर।

तेरे करम पे अबतो हुइ मुनहसर हयात,
कबतक जीयेंगे जिंदगी हो के गरीबतर।

मासूम हसरतों मे बिते ये  सारी जिंदगी ,
दिलसे निकालो सारे जजबे रकीब तर।

                मासूम मोडासवी

No comments:

Post a Comment