*-:||:- बखतर वर्णन -:||:-*
(सब छंद के अर्थ आखरमें दिये हुए है)
*| बखतर री बात |*
*(छंद दोहा)*
जंगे हरदम जीलतो, घडी घडीना घात
अणमोल गणो इतिहासमें, बखतर केरी बात
*(१)*
*| बखतर प्रशस्ति |*
*(छंद:- छप्पय)*
वेठावे नइ वार, धार न लगे धींगाणे
चर्म सके नइ चीर, तीर जितना भल ताणे
चकचूरा चहुकोर, घोर घा मारे घाती
जोर करे शिरमोर, छोर जाता नह छाती
मारी हद जोधा हांफता, हणी शके नइ हाडको
बांधे तब एवा बखतरा, पंड बने पोलाद को
*(२)*
कवच पैर कर कूच, खूंच शुं लेश न खटके
धार हजारा धरी, जरी लागे नइ जटके
जंगे मळती जीत, हीत जो होय हाडपर
मोत शको नइ मरी, धरी ल्यो वीरो धाडपर
जंगे मारो भल मचे, करे शिर से पावमें
तब जीव जरा रहतो नही ,घमसाणे सब घावमें
*(३)*
*| बखतर अंग |*
*(छंद:- दुमेल)*
ब्रंग अंग शिरस्त्राण कहावे
वार उर वक्षस्त्राण सहावै
बाजुस्त्राण कुहनी से कंधा
हस्तस्त्राण कांडे तक बंधा
*(४)*
उदरस्त्राण हो एक पेट पर
जाली ढाल अरुं पट्टे पीठ पर
पागस्त्राण को पैर पर धरा
सोय गणो संपूर्ण बखतरा
*(५)*
*| कवच प्रकार |*
*(छंद:- कुंडळियो)*
पांच कवच परकार है, पंच गिनाउ सोय
जरी लगे नइ जंगमें, वार वडा भल होय
प्रथम चर्म परकार, वार से जट फटजावै
दुजा गिनो लोखंड, पंड मुश्किल पड जावै
त्रिया चर्म-पोलाद, चत्र पोलाद राच है
पंचधातु रा श्रेष्ठ, गिनो सच कवच पांच है
*(६)*
*| शिरस्त्राण वर्णन |*
*(छंद:- छप्पय)*
शिरस्त्राण धर शिष, जटा जाली की होती
अंग दिखे बस आंख, झांखते जाणे मोती
आवे उपर अणी, घणी रण बने घातकी
बदने रक्षे ब्रंग, जंग मजबुत जातकी
सैनिक धरे सर पाघ ने, नाखे भेळी तासळी
भूपत सर कलगी धारतो, फौजदार झांखी कळी
*(७)*
*| वक्षस्त्राण वर्णन |*
*(छंद:- छप्पय)*
वक्षस्त्राण धड परे, धरे दळ गण ने भूपत
सूर्यचक्र उपरे, राजचिन्हो राखे पत
जोडे बीजी जाळ, टाळवा घाने पे'रे
कमर डोक पांसळी, खंध तक रक्षी घेरे
पंचधातु नृप पेरतो, सादा सैनिको तणा
द्ये शस्त्रोथी रक्षण सदा, घाव भले पडता घणा
*(८)*
*(छंद दोहा)*
जो हो नारी जंगमां, जुदा बखतर जोय
वक्षस्त्राण ते स्त्री तणा, स्तन आकारी सोय
*(९)*
*-कवि धार्मिक भा गढवी रचित*
*संपर्क:- 9712422105*
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छंद १ अर्थात:-
जंगमे जो क्षण क्षण घाव सहता है, जीसका इतिहासमें अमूल्य योगदान है उस बख्तर की यह बात है
छंद २ अर्थात:-
चरम जोर लगाने परभी वह शरीर को नुकसान नही होने देता, जब बख्तर पहना जाता है तो काया पोलाद की बन जाती है
छंद ३ अर्थात:-
कवच धारी को जंगमे लगने वाले सब घाव निर्जिव और निष्फल बन जाते है,
छंद ४ अर्थात:-
१)माथे पर शिरस्त्राण,
२)छाती पर वक्षस्त्राण
३)कुहनी से कंधे पर बाजुस्त्राण
४)कांडे से कुहनी पर हस्तस्त्राण
छंद ५ अर्थात:-
५)पेट पर उदरस्त्राण (वक्षस्त्राण का एक भाग)
६)पीठ पर जाली, पट्टे और ढाल
७) पैरो पर पागस्त्राण
छंद ६ अर्थात:-
१)चमडे का कवच
२)लोहे का कवच
३)पोलाद और चमडे का कवच
४)पोलाद का कवच
५)पंचधातु का श्रेष्ठ कवच
छंद ७ अर्थात:-
माथे पर पहने जाने वाला शिरस्त्राण जाली की जटा पहनने समान है, जिसमे बस दो आंखे दिखती है, उपर अणी होती है, जिससे कभी कभी वार किया जाता है, सैनिक शिरस्त्राण के रूपमें पघडी के अंदर तांसळी या धातु की गाल चीज डाल देते है, राजा शिरस्त्राणमें आकर्षक कलगी लगाता है और सेनापती राजा से थोडी कम आकर्षक कलगी लगाता है,
छंद ८ अर्थात:-
वक्षस्त्राण (कवच) को सैनिक से लेकर राजा सब पहनते है, जिसमे सूर्यचक्रके बिच राजचिन्ह होता है, वह कमर से गले और पसली से कंधो तक रक्षा देता है, राजा पंचधातु का श्रेष्ठ कवच पहनता है और सैनिक सामान्य कवच पहेनते है,
छंद ९ अर्थात:-
स्त्री के कवचमे स्तन के लिये अलगसे आकार बनाया जाता है
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