Friday, 16 June 2017

ગઝલ

खुदा का नाम ही काफी है अब ।
मरने का तो डर ही नही है अब ।।

ग़धे को बाप केह कर आया था  ।
दूसरा कोई चारा ही नही है अब ।।

हराम का पैसा नही टिक सकता ।
फुट फुट के रो बस वही है अब ।।

स्त्री पुरुष की परछाई है मानलो ।
जिस्म की आग को सही है अब ।।

दिल की हर बात में कैसे कहु में ।
बाते भी जान ले सकती है अब ।।

क्यों इश्क़ हर दफा हो जाता है ।
टुटा हुआ दिल ही तो है अब ।।

ग़ज़ल ए इश्क़ हो गया है मुझे ।
उसके नामकी गज़ले कही है अब ।।

रहीश

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