Wednesday, 7 June 2017

ગઝલ

नथी वाचाળ तो खामोश क्यां छे
करो साबित अमारो दोष क्यां छे

अमारा प्रेमनुं वर्णन नहीं थाय
अरे एवा शबदनो कोश क्यां छे ?

मने पंडित मानी पाट दीधी
तमे जोयुं नहीं के होश क्यां छे
   
जरे छे मध सूकेली डाળखी पर
छता ऐ डाળखी मदहोश क्यां छे ?

कदी मंदिर नहीं पण खूदमां जा
खबर पडशे के आशुतोष क्यां छे
           ---धर्मेश उनागर

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