बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए
मौसम के हाथ भीग के सफ्फाक़ हो गए
बादल को क्या खबर कि बारिश कि चाह में
कितने बुलंद-ओ-बाला शजर खाक़ हो गए
जुगनू को दिन के वक़्त पकड़ने की जिद करे
बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए
लहरा रही है बर्फ की चादर हटा के घास
सूरज की शह पे तिनके भी बेबाक हो गए
जब भी गरीबे-शहर से कुछ गुफ्तगू हुई
लहजे हवा-ए-शाम के नमनाक हो गए
साहिल पे जितने आब-गुज़िदा थे सब के सब
दरिया के रुख बदलते ही तैराक हो गए
परवीन शाकिर
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