Saturday, 29 July 2017

ગઝલ

बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए
मौसम के हाथ भीग के सफ्फाक़ हो गए

बादल को क्या खबर कि बारिश कि चाह में
कितने बुलंद-ओ-बाला शजर खाक़ हो गए

जुगनू को दिन के वक़्त पकड़ने की जिद करे
बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए

लहरा रही है बर्फ की चादर हटा के घास
सूरज की शह पे तिनके भी बेबाक हो गए

जब भी गरीबे-शहर से कुछ गुफ्तगू हुई
लहजे हवा-ए-शाम के नमनाक हो गए

साहिल पे जितने आब-गुज़िदा थे सब के सब
दरिया के रुख बदलते ही तैराक हो गए

   परवीन शाकिर

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