Monday, 17 July 2017

ગઝલ

गीत

छुप    बैठा   कोई   रे   जीवन   सितार   में,
जाने  वो  कैसे  उतरे, गीत  के  निखार  में।

लहर   चली  है, उमंग  उठी  नवरंग  छाया,
रिमझिम  वर्षा   की  बूँदोंने  मुझे  लुभाया।

भीगते  रहे  हम ख़ुशी  के  संग, मल्हार  में ,
रात  चुपचाप  सो   गई, गहरे  अंधकार  में।

गाँठें   बाँधीं  थीं ,वो   झटपट   खोल  डालीं ,
सारी    रंजिशें  तरन्नुम   में    घोल  डालीं।

भटके   थे  हम  आजतक, मस्त  बहार  में,
कुमकुम  वर्णी  उषा  उतरी ,तेरी  पुकार में।

बीते  हुए  लम्हे ,कभी हम  भुलाये  न भूले,
रोज़  मीठे -मीठे सपनों  के  झूलों  में  झूले।

रोशनी ही रोशनी  है  या रब  तेरे  दीदार में ,
बिक  जाऊँ  अय   खुदा   तेरे   दरबार   में।
                          ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '

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