Thursday, 17 August 2017

ગઝલ

आप की अदालत में पेश एक ग़ज़ल

वफा मेरी इबादत है वफा तेरी भी चाहत है
वफा ईमान है अपना वफा तेरी मुहब्बत है

वफा मुरली की तानों में वफा मिलती आज़ानों में
वफा ही लाज का कहना वफा धरती की आदत है

सज़ा तुम सोच लो यारों गुणाह करने से ही पहले
यहाँ भी एक अदालत है वहाँ भी एक अदालत है

चलो दिल को मिलाएं हम पुरानी भूल कर बातें
तुम्हें भी कुछ ग़िला हमसे मुझे भी तो शिक़ायत है

मुझे है प्यार ग़ुलशन से तुम्हें भी आरज़ू इसकी
चलो सीचें इसे मिल कर ये हम दोनों की ज़न्नत है

हमारी शान है भारत तुम्हारी आन है भारत
यही तो जान दोनों की यही
अपनी इबादत है

मियाँ तुम शाद हो जाओ तो हम आबाद हो जाएं
तुझे मेरी ज़रूरत है मुझे तेरी ज़रूरत है

16 /08/17 एकराम हुसैन शाद

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