Thursday, 17 August 2017

ગઝલ

अब तक नज़र मे वो ही नज़ारा है देखिये
हर  आईने   में  अक्स  पुराना  है  देखिये
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ये जर्ब़ जो हब़ीब  से मुझको  मिला कभी
जीने  का  आज वो  ही सहारा है  देखिये
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अब आईने की मुझको ज़रूरत नहीकभी
नज़रो मे उनकी खुद को संवारा है देखिये
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जितना  बसा है क़ल्ब मे मेरे  जो  प्यार ये
अब  आपके  ही  नाम तो सारा है देखिये
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अग़्यार जो रहे थे बहुत दिल के आज तक
हमने   जिग़र  मे उनको  उतारा  है देखिये
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पहलू मे  उनको  ग़ैर के  देखा है आज जो
दिल  टूटने  का  ये  तो  इशारा  है  देखिये
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दीदार  रू ब रू जो  मेयस्सर  न  हो सका
तो  ख्वाब़ मे ही उनको निहारा  है देखिये
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जब से  नज़र मे मेरी  वो  महबूब  है बसा
तब से  हसीं नज़र  का  नज़ारा  है देखिये
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वीरानियों का हर शू बसेरा थाजिस जगह
मंज़र वहाँ  का  आज तो प्यारा है देखिये
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ये  तिश्नगी  मिटाऊँ  मैं  "साहिल" यहाँ  कैसे
जब अश्क़ अपनी आँख का ख़ारा है देखिये
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----------------(साहिल रामपुरी)----------------
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