Tuesday, 29 August 2017

ગઝલ


अशआर  मिरे  यूँ  तो  जमाने के लिए हैं
कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं

अब ये भी नही ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ  दर्द  कलेजे  से लगाने के लिए हैं

आँखों में जो भर लोगे, तो कांटे से चूभेंगे
ये ख्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं

सोचो तो बड़ी चीज है तहज़ीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए है

ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें
इक शख्स की यादों को भुलाने के लिए हैं

. . जाँनिसार अख्तर

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