Tuesday, 29 August 2017

ગઝલ

आँच ज़हनों में कहीँ अपने छुपा कर रख्खें
बर्फ के शहर में कुछ धुप   बचा कर रख्खें

भीड़ में आप ना खोजना कहीँ दुनियाँ की
मुनफ़रिद अपना इक अंदाज़ बना कर रखकेँ

काम  आते  हैं  बुरे  वक़्त  में  देखा  हमने
खोटे सिक्के भी अगर हों तो बचा कर रखकेँ

देख  लेती  हैं  ज़माने  की  निग़ाहें उनको
लाख पर्दो में  गुनाहों को  छुपा कर रख्खें

अपने किरदार को सुन्नत के मुआफ़िक़ ढाले
और  जबिनो को  नमाज़ों से सजा कर रखकेँ

जो कमाया है  उसे सर्फ ना किजे 'मन्सूर'
कुछ बुढ़ापे के लिए भी तो बचा कर रख्खें

'मन्सूर'मंगलौरी

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