आँच ज़हनों में कहीँ अपने छुपा कर रख्खें
बर्फ के शहर में कुछ धुप बचा कर रख्खें
भीड़ में आप ना खोजना कहीँ दुनियाँ की
मुनफ़रिद अपना इक अंदाज़ बना कर रखकेँ
काम आते हैं बुरे वक़्त में देखा हमने
खोटे सिक्के भी अगर हों तो बचा कर रखकेँ
देख लेती हैं ज़माने की निग़ाहें उनको
लाख पर्दो में गुनाहों को छुपा कर रख्खें
अपने किरदार को सुन्नत के मुआफ़िक़ ढाले
और जबिनो को नमाज़ों से सजा कर रखकेँ
जो कमाया है उसे सर्फ ना किजे 'मन्सूर'
कुछ बुढ़ापे के लिए भी तो बचा कर रख्खें
'मन्सूर'मंगलौरी
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