Tuesday, 8 August 2017

ગઝલ

न जाने किस ने कह दिया तुम्हें? खराब है ये,
जहाँ में सब से लाजवाब है, शराब है ये;

मेरे करीब से गुजरी तो मुश्कुराइ तुम,
यकीं मैं कैसे करुं सच है या कि ख्वाब है ये?!

मैं बहोत कुछ तेरी दो आंखों में पढ पाता हूं;
क्या मेरे सामने खुली पडी किताब है ये!?

वो लोग जिसने तुम्हें देख लिया था छत पे,
उन्हों ने रात भर पूछा कि - माहताब है ये?

यूं आ के जिन्दगी में, जिन्दगी रोशन कर दो;
हटा लो रुख से जो हिजाब है, नकाब है ये!

मेरी आंखों ने तुम्हें इक सवाल पूछा है;
निगाहें तुम ने झुका दी है, क्या जवाब है ये?

: हिमल पंड्या

No comments:

Post a Comment