Tuesday, 29 August 2017

અછાંદસ

दिवार

कहा तक ,कितनी ?दिल...!
दिवार से जुडी दरारो का दामन..
थाभ कर चलना था
उन्हि के सहारे
चलकर संभलनां कब तक..
मुमकिन..!
आंधी और तुफानमे
जिवन का उन हरियाले धास की तरह
सुख कर  सडक बन जाना..
पेरो से दबे उन हालातोको
बेवजह ठुकऱानां..
कुबुल था वो वक्त
जो  दिवार बन गया
सोचना और समजनां सच मे...
अ समान हो गया जैसे गुजरता हुवा वक्त किसी कारण से ..
कही कही जगह कुरेदतां हुआ
ईस तरह गिरकर ...
दिवार जैसा ...
द्रश्य -अद्रश्य
मेरी भितर भुचाल मचाता
और दरारे..?
उसी दिवार से झाकनेका जैसे
प्रयोजन लिये ..
जब-जब देखा
तो ! हालात को जैसे
प्रदर्शित हो कर..
कुछ करीब से
दिखने वाले धुधले !
होते-होते..रिस्ते-नातेके बिच
दिवार जैसी दिखती
वैसी की वैसी आज भी..,
यह दिवार दिलको देती हर
वजह-बेवजह दस्थकत
और एक के बाद ऐक तिराड..
जर्जरित यौवनको बडी बेरहमीसे जडा दिया ..
दिवार का नाम दिवार दिया..
और बडा पहाड जैसा
पडाव ...!
दिल के बीच बडा छेद करता
जैसे ....वैसे
न जाने कैसे ?
....

जाग्रुति मारु "जागु" महुवा
दिनाक:-26-08-2017
रातके 10:51

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