इतेफाक
क्या हे जिंदगी ?
एक इतेफाक ही तो हे !
इतेफाक से हम मिले...और खिले..
ज़वा मोहब्बत जवा जिस्ममें पनपती गयी
मोहब्बत बड़ी खुश थी उसने अपना आशियाना बना लिया
फिर इतेफाक से कुछ हुवा..
लबो को ज़ंजीरो से जकड़ा गया..
शब्दों पर हमने पेहरे रख दिए ..
बोलना ..खाना...पीना ...
कुछ बाते बताना...कुछ जताना ...
उम्मीदे...वादे...कसमे...
सब कुछ तोल माप कर...
मोहब्बत रुसवा हो चली थी ...
जोशे-ऐ-जूनून का दौर खत्म हो चला था ...
ऐसे ही
हम सुलगते हुए एक दुसरे के साथ नहीं चल पायेंगे ...
आओ.. एक इतेफाक हम बनाए ...
खुद से दूर होकर आपस में मिल जाए ..
आओ...हम एहसास को ढूंढे ....
अस्मिता
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