Monday, 15 October 2018

ગઝલ

हिंदी की व्यथा

भारत में आकर अंग्रेज़ी दुल्हन हो गई।
अपने ही घर में हिंदी सौतन हो गई।

घर की मुर्गी दाल-सी लगने लगी है,
जबसे विलायती बिल्ली माखन हो गई।

अंग्रेज़ी ने जब अपना दामन फैलाया,
मातृभाषा की चाहत भी चुभन हो गई।

विश्व की दूसरी भाषा बोले जाने वाली,
हिंदी शीर्ष के लिए विरहन हो गई।

हिन्द ने अपना समझकर दूध पिलाया,
फिर भी अंग्रेज़ी कर्मों से नागन हो गई।

हिंदी एक क़दम बढ़े भी तो बढ़े कैसे?
जब अंग्रेज़ी राह रोके दुश्मन हो गई।

-विनोद सागर, जपला।

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