जिन्दगी
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गीत मेरे गा रही है जिन्दगी,
मौत को समझा रही है जिन्दगी ।
धूप में गुजरे कभी वह छांव में,
इस तरह से जा रही है जिन्दगी ।
दिल जला, छाया धुआं, बादल बना,
अश्क को बरसा रही है जिन्दगी ।
गम, खुशी, नफरत कभी, उलफत कभी,
आदमी से पा रही है जिन्दगी ।
खुद रही उलझी मगर संसार की,
उलझने सुलझा रही है जिन्दगी ।
हो जमीं, पाताल हो या आसमां,
हर जगह पर छा रही है जिन्दगी ।
दोष मैं जब भी लगाऊं ओर पर,
आइना दिखला रही है जिन्दगी ।
सख्त है, फिर भी बड़ी रंगीन है,
इसलिए तो भा रही है जिन्दगी ।
दोपहर हो, साम हो या हो सहर,
रात दिन तड़पा रही है जिन्दगी ।
था यकीं जिस पर उसी हालात से,
आज धोखा खा रही है जिन्दगी ।
'पुष्प ' मैं जब भी पुकारुं मोत को, मुस्कुराकर आ रही है जिन्दगी ।
---पबु गढवी 'पुष्प '
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