Sunday, 24 March 2019

ગઝલ

Good night...

सुनो मिर्जा.....

बे-शक आहिस्ता ही सही बेहिसाब कर रहा है,
इश्क यु ख्वाबों में आके क्युं नकाब कर रहा है,

एक शख्स जो मुझे नजरअंदाज कर रहा है,
लगता है कि वो इश्क का हिसाब कर रहा है.

युं ढूंढता है मुझे हर तरफ से समेटता मुझको,
ददॅ सीने से लगा कर खुद को किताब कर रहा हैं.

खलिश है, थी, रहेगी उम्रभर खुदा बता दे क्युं,
वो रो के अपनी आंखों को आफताब कर रहा है.

साकी कमाल है जीद ना कर पिने पिलाने की,
कमबख्त मशहूर हुए नहीं क्युं खराब कर रहा है.

देखो दूर हुए और भूलें भी नहीं आजतक मुझे वो,
जब भी देखता हू में आयना आदाब कर रहा है.

मुकम्बल ना सही इश्क तुमने भी किया था कभी,
मुड़के क्युं देखने की रस्म दिल ऐ बेताब कर रहा है.

                          पिनल " योगी "
                           24/3/19

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