ऐक जंगल जे विकसतुं जाय छे
बीजुं जंगल ऐ सुकातुं जाय छे
पंखी डोकातुं रहे छे बारीऐ
ऐम तरणाथी तूटातुं जाय छे
वृक्ष छुं केवल उझरडाओ रह्या
पोत मारुं पण भूलातुं जाय छे
तुं जेने मोसम गणे छे, मात्र ऐ
खोखलुं थई आम खरतुं जाय छे
बेउना माटे लखातुं जाय छे
बेउनुं भीतर भूंसातुं जाय छे
भरत भट्ट
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