पाक रीस्तोमें भी हम दरार कर बैठे।।
खुद ही जिंदगी अपनी तार तार कर बैठे ।।
था यकीन आएगा लौट के ना दोबारा ।
फिर भी उसी का हम इंतज़ार कर बैठे ।।
ना मिला कोई दुश्मन जब यहाँ सिवा अपने ।
इस लीए सीने पे खुद ही वार कर बैठे ।।
प्यार करने वाला तो कोई था नहीं शायद।
देखा आईना तो हम खुद से प्यार कर बैठे ।।
कर्म ही तेरा खुदा था यहां तो फिर "सर्जक" ।
क्यों नसीब पे इतना ऐतबार कर बैठे ।।
-गौतम परमार "सर्जक ",
( मोरबी जिल्ला साहित्य वर्तृळ)
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