Sunday, 9 April 2017

ગઝલ

जेने लोको  कहे छे  गोठवाई  जावानुं
ऐ छे दीवालमां जीवतां चणाई जावानुं

जो बोलो तो तरत  मोढुं सिवाई जावानुं
ने चालो तो तरत मस्तक कपाई जावानुं

वगर वांके,वगर वांके विंधाई जावानुं
कहो,शुं काम तातुं तीर खाई जावानुं?

तने  उकेलवा  कीधुं,कर्यु वधु  गूंचलुं ?
भला माणस,आ रीते गूंचवाई जावानुं?

कणसवानुं  परंतु  शुं  अबोल रहेवानुं ?
शुं आ रीते गझल तारुं रिसाई जावानुं ?

        भरत भट्ट

(' ऐक पंडितनी पोथी' संग्रहमांथी)

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