गीत
यहाँ ख़ुशी से खिलना ही ,जीवन का दस्तूर है,
कहो कली क्या तुम्हें चटकना,डाली पर मंजूर है ?
क्या संचय का राज़ खुलेगा,पोशीदा जो बागों में ?
जब धरती की कोख फलेगी,रंग लगेगा धागों में.
हर बसंत पर लुटना ,तुम्हें जरूर है. कहो 0...
क्या गिनती है तुमसे पहले कितने फले युगों में हैं ?
उनकी गर्मी दौड़ रही क्या ,शीतल पड़ी रगों में है ?
प्रेम पुकारेगा तुमको,क्यों की वो मजबूर है.कहो 0 ...
बाग पड़ा है उजड़ा , बनजारे सब चले गए,
बस्ती नहीं बसाई तो फिर,लोग कहेंगे भले गए.
इतिहास बनाने का अवसर भी भरपूर है. कहो 0...
जो पनपो तो कली,हमारी लाख दुआएं ले लेना,
युग-युग की जगमग आशा,तन-मन से उसे छू लेना.
देव शीश पर चढ़ने लायक,'कान्त'तेरा नूर है.कहो 0...
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त'
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