Monday, 17 April 2017

ગીત

गीत

यहाँ  ख़ुशी  से  खिलना ही ,जीवन का दस्तूर है,
कहो कली क्या तुम्हें चटकना,डाली पर मंजूर है ?

क्या संचय का राज़ खुलेगा,पोशीदा जो बागों में ?
जब धरती की कोख फलेगी,रंग लगेगा धागों में.
हर  बसंत  पर  लुटना ,तुम्हें जरूर है. कहो 0...

क्या गिनती है तुमसे पहले कितने फले युगों में हैं ?
उनकी  गर्मी  दौड़ रही क्या ,शीतल पड़ी रगों में है ?
प्रेम पुकारेगा तुमको,क्यों की वो मजबूर है.कहो 0 ...

बाग पड़ा है उजड़ा , बनजारे सब चले गए,
बस्ती  नहीं  बसाई तो फिर,लोग कहेंगे भले गए.
इतिहास बनाने का अवसर भी भरपूर है. कहो 0...

जो पनपो तो कली,हमारी लाख दुआएं ले लेना,
युग-युग की जगमग आशा,तन-मन से उसे छू लेना. 
देव  शीश पर चढ़ने लायक,'कान्त'तेरा  नूर है.कहो 0...
                             *** 
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त'

No comments:

Post a Comment