सदा साथ देने की खाइ कसम भी,
चले साथ लेकिन मगर दो कदम भी
उमीदों की दिलमें तो शम्अ जलादी
रहा पर ना कायम ये हमारा भरमभी
नजर की जबानी किये सारे वाअदे
निभाई न उसने वफा की रसम भी।
जमाना रहा युं तो उल्फत मखालीफ
जमाने के डरसे भुले हर कसम भी।
हमें था यकीन सा सदाकत पे उनकी
महोबत का जीसने भुलाया धरम भी ।
रहे खुश वो हमेशा करी ये दुआऐं
उठाये अकेले ही मासूम सीतम भी ।
मासूम मोडासवी
No comments:
Post a Comment