Saturday, 29 July 2017

ગઝલ

कल ही खरीदकर लाया हूं मैं नए कपड़े
कुछ देर तो ठहरो मुझे जलाने से पहले

रुका नहीं ये गुजरता कारवां कभी कहीं
सांसों को कमीज़ समझकर ही पहनले

क्या दे सकेगा कोई तुझे ग़म के खुशी
बनकर निजानंद खुद ही खुद को धर ले

पुकारते है अभी जो बहुत रंगीनियों से
कहेंगे, आग लगा दें इसे या दफन करले

कोई देखे न देखे पर वो देख रहा है
गुनाह करने से पहले थोड़ा पीछे चल ले

इसी तरह तुम जीकर आए हो 'उदयन'
देख पीछे मुड़कर और अब तो संभलले

- उदयन

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