एक धुंधली सी तस्वीर तेरी,
मेरे सीने में हसा करती हे।
में लाख छुपाऊ प्यार मगर,
वो आँखे मेरी पढ़ा करती हे।
न जाने कब तुम साँस बन गये,
धड़कन तेरा नाम लिया करती हे।
नही रह शकता एक पल भी बिन तेरे,
हर जगह आँखे तुजे ढूंढा करती हे।
ये रौशनी, ये यादे, तेरे दामन से,
मेरे दिल तक पंहुचा करती हे।
में मर रहा हु हर एक पल में देख,
तू दूर होकर मुझे तड़पाया करती हे।
सूरजमुखी कैसे जी ले बिन सूरज के,
सूरज को देखकर वो मुड़ा करती हे।
सरिता बह बह कर आखिर तो,
खुद को सागर में ओज़ल करती हे।
ये शमा जो हरवख्त जला करती हे,
परवाने को वही तो पागल करती हे।
तेरी राह में खडी एक शक्शियत देख,
तेरी राह में तेरा इतंजार करती हे।
इतनी खुदगर्ज तो तू नही जानता हु,
तू नही जो वही क्यों बना करती हे,
में तड़प रहा हु तेरे इश्क में मगर,
दूर दूर क्यों तू अब रहा करती हे।
मेरी चाहत पर यकीन नही क्या?,
मेरी चाहत से तू किनारा करती हे।
में अज्ञात दर्द से सुन्न हो रहा हु,
तू और दर्द मुझे दिया करती हे।
ये इश्क की आग में जल रहा हु में,
तू और मुझे जलाया करती हे।
नफरत करनी मुझे आती नही अब भी,
तू वो ही शिखा ने की कौशिश करती हे।
चल अब छोड़ दे सब चिंताये और,
छोड़ जो तू अब ये किया करती हे।
तेरे दिल के एक कौने में ही सही,
रख मुझे, आशिकी ये गुजारिश करती हे।
~धर्मेन्द्र सोलंकी।
०८:३४, १९/०७/१७
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