Tuesday, 29 August 2017

ગઝલ

स्वर्ग की कामिनी हो गयी
कल्पना उर्वशी हो गयी

मेघ संदेश लेकर उड़े
भावना यक्षिणी हो गयी

प्यास को तृप्ति के क्षण मिले
प्रीति कादम्बरी हे गयी

लो सफल हो गयी याचना
सृष्टि मधुवर्षिणी हो गयी

साधना जब शिखर पर चढ़ी
प्रीति अन्तर्मुखी हो गयी

आँसुओं का प्रलय देखकर
दृष्टि कामायनी हो गयी

लक्ष्य सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम्
कामना जाह्नवी हो गयी
                     -सौरभ

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