Sunday, 13 August 2017

ગઝલ

मैंने आज सवालो से जवाब मांगना छोड़ दिया
अब तो मुर्दोने भी सागरो में तैरना छोड़ दिया

लाये थे हम ऐसा गुलदस्ता बाजार से खरीद कर
मिली मुझे ना तो फुलोने खिलना छोड़ दिया

सबका में इस्तकबाल करता हूँ मेरी कब्र पर
खुदा के सामने भिखारी तरह हाथ फैलाना छोड़ दिया

बारिश होती है होने दो मुझे ऐ नजारा देखने दो
आसमान रो रहा है किसीके आँसु में भीगना छोड़ दिया

सोलंकी दीपक 'रहीश'

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