Tuesday, 26 September 2017

ગઝલ

ग़ज़ल

हम   अकेले    होते   जा   रहे  हैं ,
उड़ान  अपनी  खोते  जा  रहे  हैं।.

दिल  में   इक  लहर   उठती   है,
सूखे  खेतों  को  जोते  जा रहे हैं।

इन  आँखों  का  क्या  कसूर   है ?
कदराई    में    रोते   जा  रहे  हैं।

जमीं तो  छलकती  है  प्यार  से,
हम  बला  को  बोते  जा  र हे  हैं।

इन्तिहा   अक्ल  की   देख   ली,
क्यों  उसे  ही  ढ़ोते   जा   रहे  हैं ?
                  ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '

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