ग़ज़ल
हम अकेले होते जा रहे हैं ,
उड़ान अपनी खोते जा रहे हैं।.
दिल में इक लहर उठती है,
सूखे खेतों को जोते जा रहे हैं।
इन आँखों का क्या कसूर है ?
कदराई में रोते जा रहे हैं।
जमीं तो छलकती है प्यार से,
हम बला को बोते जा र हे हैं।
इन्तिहा अक्ल की देख ली,
क्यों उसे ही ढ़ोते जा रहे हैं ?
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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