यादें
आज मन में अजीब सी
चहलपहल थी
मेरे इर्द गिर्द कोई आवाज आई
थम सी गयी
में नंगे पाँव छत पे दौड़ा
ऐसा लगा जैसे बादलो से
किसीने इतर गिरा दिया हो
वो मेंहेक चारों और फैलती
मुझे जोर से लिपटी और
में सहम सा गया
वक़्त को भी कितनी जल्दी थी नहीं ?
पलकों जैसे गिरी और उठी
अरसा गुज़र गया...
उसके नंगे पाँव देखे
न जाने कब बचपन यौवन में तबदील हो गया
न जाने कब उसने शर्म की चुनर ओढली...
.
जुकी पलके कभी उठी ही नहीं ..
आज फिर से वो मुझसे करीब आई
कुछ कानो में कहा ....
आओ ...छुपा छुपी खेले ...?
में दौड़ा उसे अपनी आगोश में लेने
लेकिन .....
मेंहकता हुवा वो इतर था ...
ऊड गया .....
अस्मिता
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