Tuesday, 26 September 2017

અછાંદસ

यादें

आज  मन में अजीब सी
चहलपहल  थी

मेरे इर्द गिर्द कोई आवाज आई
थम सी गयी

में नंगे पाँव छत पे दौड़ा
ऐसा लगा जैसे बादलो से
किसीने इतर गिरा दिया हो

वो मेंहेक चारों और फैलती 
मुझे जोर से लिपटी और
में सहम सा गया

वक़्त को भी कितनी जल्दी थी नहीं ?
पलकों जैसे गिरी और उठी

अरसा गुज़र गया...
उसके नंगे पाँव देखे

न जाने कब बचपन यौवन में तबदील हो गया
न जाने कब उसने शर्म की चुनर ओढली...
.
जुकी पलके कभी उठी ही नहीं ..

आज फिर से वो मुझसे करीब आई
कुछ कानो में कहा ....

आओ  ...छुपा छुपी खेले ...?

में दौड़ा उसे अपनी आगोश में लेने
लेकिन .....

मेंहकता हुवा वो इतर था ...

ऊड गया .....

अस्मिता

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