Wednesday, 18 October 2017

ગઝલ

चाँद तारे, न ये रंगो - बू चाहिए
कुछ खिलौने नहीं, मुझको तू चाहिए

पत्थरों को तराशा किया उम्र भर
तेरे जैसा कोई हू -ब-हू चाहिए

वो मददगार हो, या हो दुश्मन मेरा
पीठ पीछे  नहीं रू - ब- रू चाहिए

अब हवाएँ भी रचने लगीं साज़िशें
अब चराग़ों  को भी कुछ लहू चाहिए

वो मिलेगा यक़ीनन मगर शर्त  है
आख़िरी साँस तक जुस्तजू चाहिए

- दीक्षित दनकौरी

No comments:

Post a Comment