Tuesday, 3 October 2017

ગઝલ

अपने  अपने  उसुल होते हैं,
कितने सबको कबुल होते है।

चाहते  रहे  खुशी जमाने की,
ओर खुद से तो मलुल होते हैं ।

जिंदगी  सांस सांस भटकाये,
जीनके दाअवे फुजुल होते हैं ।

शक्ल होती है बलाकी नुरानी,
हारमें जो लीपटे गुल होते हैं ।

ये करिश्मा हैदेखो फीतरत का,
खार की जद में ही फुल होते हैं ।

मनसे चाहता है कबा गुलाबो की,
उनके हिस्से मे तो बबुल होते हैं ।

कैसे  मासूम  नजर  से गुजरे हैं ,
कइ मकसद बे फुजुल होते है।

                   मासूम मोडासवी

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