Thursday, 8 March 2018

ગઝલ

🌺गजल🌺

ये चेहरा जाना पहचाना लगता है
नजदीक ही कोई ठिकाना लगता है

यूँ तो कई मिलते बिछड़ते है जमाने मे
लेकिन यह तो रिश्ता पुराना लगता है

आंख से आंख क्या मिली मेरी उनसे
अब तो खुद का दिल बेगाना लगता है

कहते है कि मुहब्बत रोग है बुरा
पर क्या करे इसे लगाना पड़ता है

चैन खो गया सुकून पा न सके
महफ़िल में भी वीराना लगता है

कब मिलेगी मुहब्बत की मंजिल
रोकने को यह जमाना लगता है

राजावत श्रवनसी

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