ऐसा भी कोई मंज़र होता,
नूर का सूरज छत पर होता.
मैं सहरा होता और मेरे ,
चारों ओर समंदर होता..
ये कितना मासूम सोच है,
मेरा घर सबका घर होता.
आँगन का जो पेड़ तू होता,
मैं भी एक कबूतर होता.
तू होता कबीर की चादर,
मैं सूफ़ी का बिस्तर होता.
तू हीरा होता मैं चाहे,
रस्ते का इक पत्थर होता.
कहाँ ज़रुरत थी दुनिया की,
तू जो मेरे अंदर होता.
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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