Friday, 16 June 2017

ગઝલ

बहुत  सपने  लेकर  निकला  हुँ
मैं  बहुत  मुश्किलों  में  पला  हुँ

गिरता  हुँ   कभी  संभलता  हुँ
मैं  फिरभी  लगातार चलता  हुँ

हर  सुबह  के संग  निकला  हुँ
मैं खुद  हर लहजे  में ढला  हुँ

कभी  मोम  जैसे  पिघलता  हुँ
मैं  सुरज  जैसे  ढलता  भी  हुँ

बहुत  सपने  लेकर  निकला  हुँ
मैं  बहुत  मुश्किलों  में  पला  हुँ



                           -मनन
                   15/6/2017

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