बहुत सपने लेकर निकला हुँ
मैं बहुत मुश्किलों में पला हुँ
गिरता हुँ कभी संभलता हुँ
मैं फिरभी लगातार चलता हुँ
हर सुबह के संग निकला हुँ
मैं खुद हर लहजे में ढला हुँ
कभी मोम जैसे पिघलता हुँ
मैं सुरज जैसे ढलता भी हुँ
बहुत सपने लेकर निकला हुँ
मैं बहुत मुश्किलों में पला हुँ
-मनन
15/6/2017
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