Sunday, 1 October 2017

ગઝલ

बात निकली मेरी बातही बातमें
बात बढती रही बातहीबातमें

रुख हवाओं का तो मैंने मोडा नही
दिलतो जीते सभी बातही बातमे

ख्वाहिश-ए-दिल वहीं तेरा मकसद वहीं
कट गई जिंदगी बातही बातमें

मैंतो तन्हा न था चाँद तारे भी थे
लो,गज़ल बन गई बातही बातही बातमें

बात थी मुख्तसर जो समजते अगर
हायरे ! आदमी बातही बातमें 

कासिम शेख "साहिल"

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