बात निकली मेरी बातही बातमें
बात बढती रही बातहीबातमें
रुख हवाओं का तो मैंने मोडा नही
दिलतो जीते सभी बातही बातमे
ख्वाहिश-ए-दिल वहीं तेरा मकसद वहीं
कट गई जिंदगी बातही बातमें
मैंतो तन्हा न था चाँद तारे भी थे
लो,गज़ल बन गई बातही बातही बातमें
बात थी मुख्तसर जो समजते अगर
हायरे ! आदमी बातही बातमें
कासिम शेख "साहिल"
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